Sunday, February 22, 2026

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥ तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥ संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥