Saturday, March 28, 2026

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥ मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥ प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥