GLORY OF LORD RAMA




Monday, February 23, 2026

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥ उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू


 

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥ निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥४॥ त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि॥ कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥


 

सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥ समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥ जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥




 

भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥ कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥ कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि


 

Sunday, February 22, 2026

जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥ तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेहि बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ


 

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥ तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥ संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥


 

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥ सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य


 

Tuesday, February 17, 2026

संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥ अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥ जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥


 

बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥ कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें॥ अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान। जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन


 

कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥ मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥